My roots..

My roots…in 1714 our landlord family shifted from Mahindragarh, Haryana to Farukhabad in Uttar Pradesh, when this city was built by Mugal rulers and later on during great plague of 1851 moved to Chandausi in the district of Moradabad in present Uttar Pradesh. I was born here in Chandausi in 1953 December and got educated in Atrauli town of nearby Aligarh district where my father shifted to teach in a local college. My higher education was completed at Allahabad University in 1973.

From 1974 I joined tea industry after getting higher education from Allahabad University. Worked in South India till 1976 and then was in Darjeeling till 1991. In 1985 to 1989 I made five consequitive records of quality and quantity in Seeyok tea estate in Darjeeling and then 1991 in Phuguri.

From 1992 to 1997 I planted tea in Uttar Dinajpur district in Bengal for Jayashree Tea & Industries Ltd. to eatablish Kumarika tea estate and then moved on to plant my own teas in nearby Kishangunj district of Bihar on the banks of Doke River for my own company Lochan Tea Limited from 1998 onwards.

चाय जिनका इश्क है, जुनून है
राजीव लोचन
1973 में दक्षिण भारत के एक चाय बागान में मात्र पांच सौ रुपये तनख्वाह पर नौकरी शुरू करनेवाले राजीव लोचन आज देश-विदेश में जाने-माने चाय शोधकर्ता (टी रिसर्चर) के रूप में खुद को स्थापित कर चुके हैं. बतौर चाय विशेषज्ञ श्री लोचन को दुनिया के कई देशों में आमंत्रित किया जा चुका है. 23 सालों तक चाय बागानों में नौकरी के बाद जब उन्होंने खुद का चाय बागान लगाया, तो चाय के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने का उनका जुनून बढ़ता ही चला गया. यह जुनून उन्हें चाय की जन्मस्थली चीन और चीनी भाषा में इस बारे में लिखी गयी प्राचीन पांडुलिपियों तक ले गया. बतौर चाय विशेषज्ञ विदेश के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में चाय को लेकर आयोजित सेमिनार व कार्यशालाओं में अपना ज्ञान और अनुभव साझा कर चुके हैं. अमेरिका की एक लेखिका धारलेने मेरी फॉल चाय के बारे में राजीव लोचन के ज्ञान से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने चाय शोध पर आधारित अपनी किताब ‘सेरेनी-टी’ में राजीव लोचन को विस्तार से स्थान दिया है.

चाय पर लिखी बेहतरीन किताब का बने हिस्सा
तकरीबन एक दशक पुरानी घटना को याद करते हुए श्री लोचन बताते हैं कि अमेरिका से एक महिला का उनके पास फोन आया. उन्होंने धारलेने मेरी फॉल के रूप में अपना परिचय देते हुए बताया कि वह विश्वभर में चाय संस्कृति शोध कर रही हैं, जिसे वह किताब के रूप में प्रकाशित करायेंगी और इसके लिए आपके सहयोग की जरूरत है. श्री लोचन बताते हैं कि बाद में लेखिका ने सिलीगुड़ी पहुंचकर संपर्क किया. तकरीबन महीने भर यहां रहकर वह हमारे परिवार के साथ घुल-मिल गयीं. इस दौरान उन्होंने लेखिका को दार्जिलिंग, डुआर्स, तराई और असम की चाय से रूबरू कराया. बतौर शोधकर्ता देश-विदेश में अब तक किये अपने चाय शोध के कई महत्वपूर्ण तथ्यों से भी लेखिका को अवगत कराया. श्री लोचन कहते हैं कि इससे प्रभावित होकर उन्होंने अपनी किताब में मेरे द्वारा दी गयी चाय की तमाम जानकारियों को मेरे नाम से ही प्रकाशित कर मुझे एक अनमोल तोहफा दिया.

एमएससी के बाद की चाय उद्योग में नौकरी
राजीव लोचन का जन्म 10 दिसंबर, 1953 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद शहर के पास स्थित चंदौसी कस्बे में हुआ. पिता स्वर्गीय वैद्य प्रकाश गुप्ता और माता कमला देवी गुप्ता के लाडले राजीव लोचन की की प्रारंभिक शिक्षा उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के अतरौली में हुई. उनके पिता शिक्षक थे और बेटे की पढ़ाई को लेकर काफी सजग थे. 1969 में उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की. इसके बाद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से उन्होंने 1973 में केमिस्ट्री में एमएससी की डिग्री ली. इसी बीच उन्हें दक्षिण भारत के एक चाय बागान में नौकरी का अवसर मिला. उमंग और उत्साह से भरे श्री लोचन कोयंबटूर पहुंचे. यहां उन्होंने चाय उद्योग में देश की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी बिरला ग्रुप की जयश्री टी एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड के शोलायार टी एस्टेट में इंटरव्यू दिया. पहले इंटरव्यू में ही कंपनी ने उनको असिस्टेंट मैनेजर की जिम्मेदारी सौंप दी और उनकी पहला तनख्वाह 500 रुपये तय हुई. तीन साल इस चाय बागान में नौकरी के बाद कंपनी ने उनका 1976 में दार्जिलिंग के अपने एक चाय बागान में तबादला कर दिया. श्री लोचन अपने पूरे परिवार के साथ दार्जिलिंग आ गये.

चाय बागानों के सफलतम मैनेजर रहे
कुछ ही सालों की नौकरी के बाद राजीव लोचन एक कुशल बागान मैनेजर बन गये. 1990 में फुगुड़ी टी एस्टेट ने अधिकतम चाय उत्पादन किया. यह आज भी एक रिकॉर्ड. यह चमत्कार किया था राजीव लोचन ने. 27 सालों से कानूनी पचड़ों की वजह से उपेक्षित पड़े एवोंग्रोव टी एस्टेट को लांगव्यू टी कंपनी ने 1992 में अधिगृहीत किया. इस बागान को पटरी पर लाने का श्रेय श्री लोचन को ही जाता है. 1997 में जयश्री कंपनी ने उन्हें दिनाजपुर के चाय के कारोबार को संभालने के लिए जेनरल मैनेजर बनाकर भेजा. उन्होंने लांगव्यू, सीयोक, जुंगपाना, अम्बूटिया, फुगुड़ी, ओकायाटी जैसे चाय बागानों में काम करते हुए चाय उद्योग का बेहरतीन तजुर्बा हासिल किया.

किशनगंज में लगाया अपना चाय बागान
राजीव लोचन ने नौकरी के दौरान ही 1991 में लोचन संस इंटरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी चाय कारोबार के लिए बनायी. बाद में नौकरी छोड़कर 1998 में लोचन टी लिमिटेड कंपनी स्थापित कर उन्होंने लोचन टी ब्रांड से चाय का उत्पादन शुरू किया. इस दौरान वह अपने पूरे परिवार के साथ सिलीगुड़ी आ बसे. 1998 में सिलीगुड़ी से तकरीबन 100 किमी दूर बंगाल-बिहार सीमा के पास किशनगंज इलाके में डोक नदी के किनारे डोक टी एस्टेट शुरू किया. इसी वर्ष उन्होंने सिलीगुड़ी से चाय निर्यात का कारोबार भी शुरू किया. उनका चाय का कारोबार आज देश के साथ-साथ चीन, जापान, कनाडा, अमेरिका व अन्य कई देशों तक फैला हुआ है. उन्होंने सीटीसी चाय की जगह ऑर्गेनिक व्हाइट टी के उत्पादन को अधिक तवज्जो दी. चाय के बारे में अपनी जानकारी के खजाने को और समृद्ध करने के लिए उन्होंने दार्जिलिंग, असम, सिक्किम, दक्षिण भारत, चीन, जापान की यात्राएं की.

पत्नी भी चाय के सफर की साथी
चाय पर शोध के लिए श्री लोचन ने सिलीगुड़ी के सेवक रोड स्थित अपने दफ्तर के एक कमरे में प्रयोगशाला खोल रखी है. चाय के उनकी पत्नी मनीषा लोचन भी चाय के सफर की सहयात्री हैं. बेटी नेहा का विवाह हो चुका है. बेटा विवेक चाय के कारोबार में पूरी मेहनत से साथ देता है. उन्हें पूरे परिवार का भरपूर सहयोग मिलता है. उनकी पत्नी मनीषा भी अपने चाय बागान के पत्तों से पूरी तरह हाथों से निर्मित डोक ब्लेक फ्यूजन, डोक डायमंड ग्रीन, डोक सिल्वर नीडल नामक ब्रांड की ऑर्गेनिक चाय का उत्पादन करने में सक्रिय भूमिका अदा कर रही हैं. फोटोग्राफी, ट्रेवलिंग व चाय के शौकीन श्री लोचन ऑर्गेनिक चाय को पूरे देश-दुनिया में और विस्तार करना है.

चीन में टी बोर्ड से भारत का प्रतिनिधित्व किया
बतौर चाय शोधकर्ता व विशेषज्ञ के रूप में पहली बार चीन में इंटरनेशनल टी फोरम ऑर्गनाइजिंग कमेटी के सेमिनार में टी बोर्ड से भारत का प्रतिनिधत्व किया. बाद में अमेरिकन टी एसोसिएशन, कनेडियन टी एसोसिएशन, यूके टी एसोसिएशन व अन्य देशों की टी एसोसिएशन में भी भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआइआइ) के प्रतिनिधि के रूप में भारत का प्रतिनित्व करने का उन्हें मौका मिल चुका है. इस दौरान उन्होंने विदेशी सरजमीं पर भारत का परचम लहराने में कोई मौका नहीं गंवाया. वह 2009-10 में सीआइआइ के उत्तर बंगाल चैप्टर से जुड़े और 2017-18 में चेयरमैन का दायित्व संभाला. साथ ही वह सिलीगुड़ी टी ट्रेडर्स एसोसिएशन व अन्य कारोबारी संगठनों के अलावा महावीर इंटरनेशनल जैसे सामाजिक संगठनों से भी जुड़े.

राजघराने से जुड़ा था खानदान
राजीव लोचन का खानदान 1851 से हरियाणा के राजघराने से जुड़ा है. बाद में राजशाही समाप्त होने के बाद उनके पूर्वज उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में आ बसे. फिर वे लोग मुरादाबाद के पास चंदौसी आ गये, जहां फर्रुखाबाद दरवाजा और हवेली आज भी मौजूद है. बगैर देखरेख के अब यह हवेली खंडहर में तब्दील होती जा रही है. उत्तर प्रदेश में रहते हुए उनके पूर्वज चीनी और खांड (एक प्रकार का गुड़) के कारोबार से जुड़े. यह कारोबार श्री लोचन के परदादा स्व. लाला राम चरण दास गुप्ता उर्फ साहु साहब, दादाजी स्व. लाला राम शरण दास गुप्ता (साहु साहब) ने संभाला.

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